Friday, 19 July 2013

कदमो में ताजमहल रखा हे


क्या बताये खुद को तुम्हारे लिया कितना बदल रखा हे
जो कभी था भरा पैमाना उसे खाली आजकल रखा हे
मत आजमाना कभी तुम्हे औकात का अंदाजा ही क्या हे
लगते ही फ़क़ीर हे हम वरना कदमो में ताजमहल रखा हे

.. पवन 

देखो आया में बनके लुटेरा में लुटेरा... हा में हु लुटेरा......


तेरे ख्वाबो में भरने अँधेरा 
देखो आया में बनके लुटेरा 
में लुटेरा... हा में हु लुटेरा......
जब से आया हु में तेरी जिंदगानी में 
पलके रहने लगी तबसे तेरी पानी में
तेरे चेहरे में बस रहती थी मोह्हबत 
मेने लिखा हे बस हिज्र तेरी कहानी में 

तेरी नफरत में देना तू बसेरा
देखो आया में बनके लुटेरा 
में लुटेरा... हा में हु लुटेरा......

चंद लम्हों में तुझको इतना जाना
जेसे नाता हो तुझसे सदियों पुराना
उन सिसकियो को बंद कमरे में भरना
ताकि ताने ना कास पाए ये जमाना 
तेरी सांसो पर डाला मेने डेरा 
देखो आया में बनके लुटेरा 
में लुटेरा... हा में हु लुटेरा......

दो जानो का बना हु में हथियारा
एक दिल तेरा ,एक दिल मेरा बेचारा 
में अब जिन्दा बस एक लो की तरह
कोई करो दो अब आंधी को इशारा 
ना हो अब मेरे लिए कभी सवेरा
देखो आया में बनके लुटेरा 
में लुटेरा... हा में हु लुटेरा.....

अपनी यादो से कहो हद में रहा करे

अपनी यादो से कहो हद में रहा करे
मेरे ख्वाबो में ना आकर वफ़ा करे
अपनी यादो से कहो हद में रहा करे

में करूँगा अगर वफ़ा फिर तुमसे
तुम कहोगी अब दिल लगाना नहीं
मेरी रूह के सहारे जी लोगी मगर
बस मेरी देह को अब आजमाना नहीं
इतना हे गुरुर अगर तुम्हे खुदपर
रोक लेना खुद को मेरा होने से
मेरी आँखों में एक दफा देखना डूबकर
बचा सको बचा लेना खुद को खोने से

जब उनका हे ना कोई वजूद सनम
तो मेरे बारे में भी वो कुछ ना कहा करे
अपनी यादो से कहो हद में रहा करे
मेरे ख्वाबो में ना आकर वफ़ा करे

तेरे जाने से मेरे लफ्जो का हाल बुरा
कहेने क्या लिखने में भी लडखडाता हु
लिखना चाहा जब मोह्हब्बत मेने
लकीर को फिर तुझ तक ले आता हु
अब तू बया कर कोई एसा सफ़र
ना बनाऊ में जिसकी तुझसे मंजिल
राह में ही मिल जाये मुझे इतनी पनाह
ना मागे कुछ और फिर मेरा दिल

मुझको जो कर दिया अता इतने जख्म
कहो कुछ उनका दर्द खुद भी सहा करे
अपनी यादो से कहो हद में रहा करे
मेरे ख्वाबो में ना आकर वफ़ा करे


...pavan

मेरा यार उंगलियों में उंगलिया डाल चलने से मुकर जाता हे mukar jata he

मेरा यार उंगलियों में उंगलिया डाल चलने से मुकर जाता हे
अकेला ही जाता हे जहा जाता हे  क्या इल्म किधर जाता हे 
में उसकी यादो को जलाता हु सर्द हवाओ की खातिर
फिर अपनी ही आँखों से उसपर पानी बिखर जाता हे
अधजली यादो की राख की सेक मुझे सुला देती हे
पर ख्वाब टूट जाते जब ये महताब गुजर जाता हे 
जब भी होश मिला खुद को मखाने में पाया मेने
तन्हा रहने पर हर किस्म का नशा उतर जाता हे
तुमने जाते वक्त कहा था मुझसे कुछ बनकर दिखाना
अश्को के दरिया में डूबकर आखिर कोन उभर पता हे 
कुछ ज्यादा ही सिद्दत दिखा दी मेने तेरी चाह में
तभी मुझे मेरे जनाजे में हर तरफ तेरा कन्धा नजर आता हे 
फिर जन्म लूँगा खुद को तेरे मुताबिक बना लूँगा
सुना हे सजा-ए-मोत पाकर हर गुन्हेगार सुधर जाता हे

.......पवन राजपूत

Tuesday, 11 June 2013

lovebar drems


जख्मो की तिजारत के लिए तय ओकात नहीं होती
इशक का कोई मजहब और कोई जात नहीं होती
और किसी के दर पर मोहब्बत रोज दस्तक दिया करती हे
किसी की मोह्हबत से ख्वाबो में भी मुलाकात नहीं होती

कुछ वक्त बाद तो मेरे दर्द का भी अंदाज बदलने वाला हे


कुछ वक्त बाद तो मेरे दर्द का भी अंदाज बदलने वाला हे
क्योकि वो अश्क बनकर मेरी पलकों से निकलने वाला हे 
वक्त बेवक्त बस में कोशिश करता हु के तुम बदल जाओ 
पर ये कोन जनता हे के आखिर पत्थर कब पिघलने वाला हे 

और संभाल कर रखना दिल वालो अपने अपने दिलो को 
सब कुछ भुलाकर मेरा दिल अब फिर मचलने वाला हे 

मेरी हस्ती मुस्कुराती जिन्दगी अब किसी के भरोसे नहीं 
ये जानकर मुझसे खुदगर्ज जमाना तो क्या खुदा जलने वाला हे

Monday, 10 June 2013

पहाड़ो के भी सीने से मेने बहता अश्को का समुन्दर देखा हे

पहाड़ो के भी सीने से मेने बहता अश्को का समुन्दर देखा हे 
बेसक बया ना करो पर दर्द वो तो तुम्हारे दिल के अन्दर देखा हे
और एक तुम ही हो जो अब तक नहीं भीगे उस खारे पानी से 
वरना हमने तो मोहब्बत में हरता हुआ सिकंदर देखा हे

जो आसमान नजाने कितनो को तर किया करता था
उसे भी मोहब्बत की तलब में होता हुआ बंजर देखा हे

कब्र में हम ना चैन और ना सुकून से रह सके क्योकि
अपने ही रकीब के हाथो में अपनी मोत का खंजर देखा हे

अब तुमसे ना और कुछ कहना ना सुनना हे मुझे
जब तुम अपने अश्क छुपा रही थी मेने वो मंजर देखा हे